तपस्या और श्रद्धा का पर्व: मधुश्रावणी
नवविवाहित मैथिल ब्राह्मण महिलाओं की आस्था का प्रतीक

भागलपुर के बूढ़ानाथ मौहल्ला में पूजा करती नवविवाहिता श्रावण मास की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत इस वर्ष 15 जुलाई से हुई, जो 27 जुलाई तक चलेगा।
यह पर्व विशेष रूप से मैथिल ब्राह्मण समाज की नवविवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है और इसे पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक सौहार्द्र की कामना के साथ तप और श्रद्धा के रूप में मनाया जाता है।पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी पार्वती ने सबसे पहले मधुश्रावणी व्रत किया था।
तप के बल पर उन्होंने हर जन्म में भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया। उसी आस्था और परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नवविवाहिता महिलाएं भी इस व्रत का पालन करती हैं, जो तपस्या के समान कठिन माना जाता है।मधुश्रावणी पर्व में नवविवाहिताएं 14 दिनों तक व्रत रखती हैं, जिसमें वे सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं और नमक का पूरी तरह त्याग करती हैं।प्रत्येक दिन महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती तथा नाग देवता की पूजा करती हैं और उनसे सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मांगती हैं।
पूजन के दौरान धार्मिक कथाएँ और लोकगाथाएँ भी सुनाई जाती हैं, जो जीवन मूल्यों, नारी की शक्ति और पारिवारिक जीवन के आदर्शों को उजागर करती हैं। व्रत के अंतिम दिन विशेष पूजन, सामूहिक कथा और पारंपरिक व्यंजन के साथ इसका समापन होता है।मधुश्रावणी न केवल एक धार्मिक व्रत है,
बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी मैथिल समाज की पहचान है। यह पर्व स्त्री की श्रद्धा, त्याग और प्रेम का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है और समाज में दांपत्य जीवन की मर्यादा व परंपरा को सहेजने का कार्य करता है।
