152 साल पुराना बाराहाट दुर्गा मंदिर: आस्था और इतिहास का संगम

रिपोर्ट — ऋषभ गुप्ता, बाराहाट
बाराहाट बाजार स्थित दुर्गा मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि 152 वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा, आस्था और इतिहास का प्रतीक है। इसकी स्थापना पंजवारा के जमींदार शालिग्राम प्रसाद सिंह ने की थी। नवरात्र के दौरान यहां प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की परंपरा आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है।
जमींदारी से जन-सहभागिता तक
शुरुआत में माता की प्रतिमा एक साधारण फूस की झोपड़ी में स्थापित की जाती थी। जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां पक्का मंदिर बना। 1950 के बाद मंदिर का विस्तार होता रहा और आज यह एक भव्य भवन के रूप में सामने है। मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए एक रंगमंच भी है। यह मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि पीढ़ियों की आस्था और सामूहिक समर्पण का प्रमाण है।
बलि प्रथा का अंत
मंदिर से जुड़ी एक बड़ी परंपरा में बदलाव बलि प्रथा का अंत है। पहले यहां भैंस और भेड़ की बलि दी जाती थी, लेकिन ग्रामीणों और समिति के निर्णय के बाद इसे रोक दिया गया। हालांकि भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर पाठवली चढ़ाते हैं। अष्टमी और नवमी को यहां हजारों की भीड़ उमड़ती है।
वर्तमान समिति और परंपराएं
फिलहाल, मंदिर का संचालन एक समिति करती है। अध्यक्ष सुनील कुमार चौधरी, सचिव राजीव लोचन मिश्र और कोषाध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी के नेतृत्व में हर साल भव्य नवरात्र महोत्सव का आयोजन होता है। सालोंभर पुजारी महेश तिवारी द्वारा नियमित पूजा-अर्चना और संध्या आरती की जाती है। नवरात्र के दौरान एक से दस पूजा तक विशेष आयोजन होते हैं।
शोभायात्रा और विसर्जन
मंदिर की खास परंपरा विजयादशमी के बाद एकादशी को होने वाली शोभायात्रा है। गाजे-बाजे के साथ प्रतिमा को नगर भ्रमण कराया जाता है और निकटवर्ती तालाब में विसर्जन होता है। यह परंपरा आस्था और उत्सव का प्रतीक मानी जाती है।
लोगों की जुबानी

- सुनील कुमार चौधरी, अध्यक्ष: “पहले पूजा एक झोपड़ी में होती थी। आज भव्य मंदिर खड़ा है, यह हम सबके लिए गर्व की बात है।”

- अशोक कुमार चौधरी, कोषाध्यक्ष: “सच्चे मन से यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है। अष्टमी और नवमी की पूजा विशेष होती है।”

- राजीव लोचन मिश्र, सचिव: “मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। लोग अपनी मनोकामना लेकर यहां आते हैं।”

- महेश तिवारी, पुजारी: “सालोंभर संध्या आरती और पूजा का आयोजन होता है। ग्रामीण और बाहर से आए श्रद्धालु प्रतिदिन माता के दर्शन करते हैं।”
