समर कैंप में दिखी स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की झलक

मंजूषा कला, छठ गीत और लोकनृत्य के माध्यम से बच्चों ने जाना अपनी परंपरा का महत्व

जगदीशपुर। सरकारी विद्यालयों में आयोजित भारतीय भाषा समर कैंप के अंतर्गत शुक्रवार को स्थानीय सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं पर आधारित विशेष गतिविधियों का आयोजन किया गया। इस दौरान बच्चों ने संगीत, नृत्य, चित्रकला और लोकगीतों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने और उसे संरक्षित करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने विद्यालय परिसर को पूरी तरह सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया।
मध्य विद्यालय जगदीशपुर में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण भागलपुर की प्रसिद्ध मंजूषा कला, लोकपर्व छठ और बिहुला-विषहरी पूजा से जुड़ी गतिविधियां रहीं। बच्चों ने रंग-बिरंगी चित्रकलाओं, पारंपरिक गीतों और लोकनृत्यों के जरिए अपनी लोक संस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों की रचनात्मकता और उत्साह देखने लायक था।
प्रधानाध्यापक आशुतोष चन्द्र मिश्र ने बच्चों को मंजूषा कला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसकी विशेषताओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मंजूषा कला भागलपुर की प्राचीन लोककला है, जो बिहुला-विषहरी कथा से जुड़ी हुई है। इस कला में सांप, फूल-पत्तियां, देवी-देवताओं और पारंपरिक आकृतियों का विशेष महत्व होता है। उन्होंने बच्चों को पेंटिंग की बुनियादी अवधारणाओं को सरल तरीके से समझाते हुए बताया कि अपनी संस्कृति और परंपरा को जानना प्रत्येक विद्यार्थी के लिए आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता के इस दौर में लोककलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। ऐसे में विद्यालय स्तर पर इस प्रकार की गतिविधियों का आयोजन बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपनी स्थानीय कला और संस्कृति को केवल किताबों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे व्यवहारिक रूप से सीखें और आगे बढ़ाएं।
कार्यक्रम के दौरान बच्चों ने मंजूषा कला पर आधारित कई आकर्षक चित्र बनाए। किसी ने बिहुला की कथा को चित्रों में उकेरा तो किसी ने विषहरी पूजा से जुड़े पारंपरिक प्रतीकों को रंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया। बच्चों द्वारा बनाई गई कलाकृतियों की शिक्षकों और अभिभावकों ने काफी सराहना की।
वहीं विद्यालय की शिक्षिका वीणा कुमारी, शाहिना खातून, प्रतिमा मिश्रा, प्रज्ञा, प्रीति कुमारी तथा भारती कुमारी के नेतृत्व में छात्र-छात्राओं ने छठ पर्व से संबंधित पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए। “केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव” और “उठउ हो सूरज देव” जैसे लोकगीतों की प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। बच्चों ने छठ पर्व के महत्व, उसकी परंपरा और प्रकृति से उसके संबंध को भी समझाया।
कार्यक्रम में स्थानीय लोकसंगीत और लोकनृत्य की भी शानदार प्रस्तुति हुई। छात्राओं ने पारंपरिक परिधानों में लोकनृत्य प्रस्तुत कर सभी का मन मोह लिया। ढोलक और मंजीरे की थाप पर प्रस्तुत किए गए नृत्य ने उपस्थित लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। विद्यालय परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
शिक्षकों ने बताया कि भारतीय भाषा समर कैंप का उद्देश्य केवल भाषाई ज्ञान देना नहीं है, बल्कि बच्चों को भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा और सामाजिक मूल्यों से जोड़ना भी है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए स्थानीय सांस्कृतिक गतिविधियों को समर कैंप का हिस्सा बनाया गया है।
विद्यालय के शिक्षकों का कहना था कि इस प्रकार की गतिविधियां बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ-साथ उनकी रचनात्मक क्षमता को भी विकसित करती हैं। साथ ही वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। बच्चों में टीमवर्क, सहयोग और सामाजिक जुड़ाव की भावना भी मजबूत होती है।
समर कैंप में शामिल बच्चों ने भी इस आयोजन को बेहद खास बताया। छात्र-छात्राओं ने कहा कि उन्हें अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं के बारे में नई जानकारियां मिलीं। कई बच्चों ने पहली बार मंजूषा कला के बारे में विस्तार से जाना और खुद चित्र बनाने का अनुभव प्राप्त किया। वहीं छठ गीत और लोकनृत्य की प्रस्तुति में भाग लेकर वे काफी उत्साहित नजर आए।
अभिभावकों ने भी विद्यालय की इस पहल की सराहना की। उनका कहना था कि आज के समय में बच्चे मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में ज्यादा व्यस्त रहते हैं, जिससे वे अपनी परंपराओं और लोक संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रम बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का बेहतरीन माध्यम साबित हो रहे हैं।
कार्यक्रम के अंत में प्रधानाध्यापक आशुतोष चन्द्र मिश्र ने सभी बच्चों और शिक्षकों को धन्यवाद देते हुए कहा कि भविष्य में भी इस प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन लगातार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के साथ उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ना भी है।
समर कैंप में बच्चों के उत्साह, शिक्षकों की मेहनत और लोकसंस्कृति की सुंदर प्रस्तुतियों ने यह साबित कर दिया कि यदि सही दिशा और अवसर मिले तो नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल समझ सकती है, बल्कि उसे गर्व के साथ आगे भी बढ़ा सकती है।
