गुरु पूर्णिमा पर सुल्तानगंज में श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम, नमामि गंगे घाट और अजगैबीनाथ मंदिर पर उमड़ी भीड़
रिपोर्ट – शयामानंद सिंह, भागलपुर

सुल्तानगंज (भागलपुर)
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सुल्तानगंज का पवित्र उत्तरवाहिनी गंगा तट श्रद्धा, आस्था और भक्ति से सराबोर हो गया। नमामि गंगे घाट और अजगैबीनाथ मंदिर परिसर में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। हर ओर “हर हर महादेव” और “बोल बम” के गगनभेदी जयघोष गूंज रहे हैं, जिससे पूरा वातावरण शिवमय हो गया है।
भागलपुर, बांका, मुंगेर, नवगछिया, पूर्णिया, कटिहार सहित झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, असम और नेपाल तक से श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। भक्तगण गंगा में पुण्य स्नान कर कंधे पर कांवड़ उठाकर बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) के लिए 105 किलोमीटर लंबी पदयात्रा पर निकल रहे हैं। पूरा सुल्तानगंज इलाका केसरिया रंग में रंग गया है, और कांवड़ियों की लगातार आवाजाही से नगर की गलियां भक्तिमय हो उठी हैं।
श्रद्धालु घंटों लाइन में लगकर नमामि गंगे घाट से गंगाजल भर रहे हैं। इसके बावजूद न उनके चेहरे पर थकावट है और न ही भक्ति में कोई कमी। महिलाएं, युवा, बुजुर्ग सभी में जबरदस्त उत्साह और उमंग देखने को मिल रहा है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
श्रावणी मेले के मद्देनज़र जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है। गंगा घाटों पर विशेष निगरानी के लिए ड्रोन कैमरे तैनात किए गए हैं। हर चौराहे पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। मेडिकल कैंप, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, जलपान और ठहराव के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। अधिकारियों की टीम लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है।
श्रद्धालुओं की राय
🔸 सुबोध तिवारी (सारण जिला) ने कहा – “हर साल मैं गुरु पूर्णिमा पर यहां आता हूं। गंगा स्नान और कांवड़ यात्रा की शुरुआत यहीं से करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।”
🔸 मिलीनी दयंती (असम) ने कहा – “इतनी भीड़ के बावजूद यहां की व्यवस्था देखकर मन प्रसन्न हो गया। श्रद्धा के साथ-साथ सुरक्षा का भी पूरा ख्याल रखा गया है।”
🔸 पिंकी देवी (दिल्ली) बोलीं – “यहां की गंगा बहुत पावन लगती है। अजगैबीनाथ बाबा के दर्शन कर और जल लेकर मन को शांति मिली।”
🔸 दीपक कुमार दास (असम) ने कहा – “श्रद्धा और सेवा का यह अद्भुत संगम मैंने पहले कभी नहीं देखा। यहां की मिट्टी में ही कुछ खास है।”
गुरु पूर्णिमा पर सुल्तानगंज की गंगा तट एक बार फिर भक्ति, श्रद्धा और आस्था की जीवंत मिसाल बन गई है। यहां से शुरू होने वाली यह कांवड़ यात्रा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि भारतीय संस्कृति और सामूहिक चेतना का प्रतीक भी बन चुकी है।
